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भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन "घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005" (Protection of Women from Domestic V

घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 की धारा 11 से 19in hindi 





महिला  सुरक्षा 

आज हमरे भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन "घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005" (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) एक विशेष और प्रभावी कानून है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को पारिवारिक उत्पीड़न से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। इस लेख में हम अधिनियम की धारा 11 से 19 तक को विस्तारपूर्वक, सरल भाषा में समझेंगे।


घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 की धारा 11 से 19in hindi 

 

धारा 11: सरकार की जिम्मेदारियाँ

इस धारा के अनुसार केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे इस कानून के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक कदम उठाएं:

  • जन-जागरूकता: टीवी, रेडियो और प्रिंट मीडिया के माध्यम से अधिनियम का प्रचार-प्रसार किया जाए।

  • प्रशिक्षण: पुलिस, न्यायपालिका और अन्य अधिकारियों को इस कानून से संबंधित प्रशिक्षण और जागरूकता दी जाए।

  • विभागीय समन्वय: कानून, स्वास्थ्य, महिला कल्याण और गृह मंत्रालय जैसे विभागों के बीच तालमेल सुनिश्चित किया जाए।

  • सेवा प्रोटोकॉल: महिला सुरक्षा से जुड़े विभागों के लिए स्पष्ट कार्यप्रणाली विकसित की जाए।

👉 यह धारा सुनिश्चित करती है कि कानून सिर्फ कागज़ों पर ना रहकर ज़मीनी स्तर पर प्रभावशाली तरीके से लागू हो।


 धारा 12: मजिस्ट्रेट से राहत प्राप्त करने हेतु आवेदन

  • कोई भी पीड़ित महिला, संरक्षण अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से मजिस्ट्रेट को आवेदन दे सकता है।

  • आवेदन में घरेलू हिंसा की जानकारी और मांगी गई राहत जैसे मुआवजा, सुरक्षा आदेश आदि शामिल हो सकते हैं।

  • यदि पहले से कोई घरेलू घटना रिपोर्ट (Domestic Incident Report) मौजूद हो, तो मजिस्ट्रेट उसे भी विचार में लेगा।

  • सुनवाई की पहली तारीख आवेदन मिलने के तीन दिन के भीतर तय करनी होती है।

  • मामले का निपटारा 60 दिनों के भीतर करने का प्रयास किया जाता है।

👉 यह धारा पीड़िता को त्वरित न्याय प्राप्त करने का अधिकार देती है।



धारा 13: नोटिस की सेवा

  • मजिस्ट्रेट द्वारा तय की गई सुनवाई की तारीख की सूचना संरक्षण अधिकारी को दी जाती है।

  • अधिकारी को दो दिनों के भीतर आरोपी (उत्तरदाता) को नोटिस देना होता है।

  • सेवा की पुष्टि के लिए एक घोषणा पत्र प्रस्तुत किया जाता है, जिसे वैध प्रमाण माना जाता है जब तक कि इसे गलत साबित न किया जाए।

👉 इस प्रक्रिया से आरोपी को समय पर कानूनी सूचना प्राप्त होती है और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित होती है।



धारा 14: परामर्श (Counselling)

  • मजिस्ट्रेट किसी भी समय, पीड़िता या आरोपी को काउंसलिंग के लिए कह सकता है।

  • यह परामर्श सेवा प्रदाता द्वारा दी जाती है जिसे उचित योग्यता व अनुभव प्राप्त हो।

  • परामर्श के बाद अगली सुनवाई दो माह के अंदर रखी जानी चाहिए।

👉 यह प्रक्रिया विवाद के शांतिपूर्ण समाधान का अवसर देती है।



 धारा 15: कल्याण विशेषज्ञ की सहायता

  • मजिस्ट्रेट किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जो महिला कल्याण या पारिवारिक विवाद निपटारे में विशेषज्ञ हो (महिला को प्राथमिकता), कार्यवाही में मदद के लिए नियुक्त कर सकता है।

👉 इससे मजिस्ट्रेट को निर्णय लेने में सामाजिक और मानसिक पहलुओं को समझने में सहायता मिलती है।









धारा 16: कैमरा में कार्यवाही (In-camera Proceedings)

  • यदि आवश्यक हो, या यदि कोई पक्ष चाहे, तो कार्यवाही को कैमरा में (गोपनीय रूप से) किया जा सकता है।

👉 यह पीड़िता की गरिमा और मानसिक स्थिति की रक्षा करता है। धारा 17: साझा घर में रहने का अधिकार

  • महिला को अपने shared household में रहने का पूरा अधिकार है, भले ही उसका उस संपत्ति पर कोई कानूनी स्वामित्व न हो।

  • बिना कानूनन प्रक्रिया के उसे उस घर से निकाला नहीं जा सकता।

👉 यह एक क्रांतिकारी प्रावधान है जो महिलाओं को बेघर होने से बचाता है।



 धारा 18: सुरक्षा आदेश (Protection Orders)

यदि मजिस्ट्रेट को यह लगता है कि घरेलू हिंसा हुई है या होने की आशंका है, तो वह निम्नलिखित सुरक्षा आदेश जारी कर सकता है:

  • आरोपी को हिंसा करने से रोकना

  • पीड़िता के कार्यस्थल या बच्चों के स्कूल में जाने से रोकना

  • पीड़िता से संपर्क करने पर प्रतिबंध

  • पीड़िता की संपत्ति, बैंक खाता, स्त्रीधन आदि से छेड़छाड़ पर रोक

  • पीड़िता के समर्थन करने वाले लोगों को नुकसान पहुँचाने पर रोक

👉 यह पीड़िता को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से सुरक्षा देता है।



 धारा 19: निवास आदेश (Residence Orders)

मजिस्ट्रेट निम्नलिखित आदेश जारी कर सकता है:

  • पीड़िता को साझा घर से बेदखल नहीं किया जाए।

  • आरोपी को घर से बाहर करने का आदेश (लेकिन महिला पर यह आदेश लागू नहीं होगा)।

  • आरोपी या उसके रिश्तेदार को घर के उस हिस्से में प्रवेश करने से रोकना जहां पीड़िता रहती है।

  • घर को बेचने या गिरवी रखने पर रोक।

  • वैकल्पिक निवास स्थान की व्यवस्था या उसका किराया देना।

👉 इस धारा से यह सुनिश्चित होता है कि पीड़िता को रहने की सुरक्षित जगह मिले, और वह हिंसक वातावरण से बाहर आ सके।


घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 की धारा 11 से 19in hindi 





 घरेलू हिंसा अधिनियम 2005: महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा

भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 (The Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) एक ऐसा विशेष कानून है, जो महिलाओं को उनके घर में ही होने वाले अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह कानून महिलाओं को मानसिक, शारीरिक, यौन, मौखिक और आर्थिक हिंसा से बचाने के लिए बनाया गया है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि यह कानून क्या है, इसके अंतर्गत कौन-कौन से Protection OrderShared Household Rights और अन्य Legal Protections for Women in India मिलते हैं।



📌 घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 क्या है?

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 महिलाओं को उनके परिवार या घरेलू रिश्तों में होने वाली हिंसा से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है। यह कानून 26 अक्टूबर 2006 से पूरे भारत में लागू हुआ। इसका उद्देश्य न केवल महिलाओं को सुरक्षा देना है, बल्कि उन्हें पुनर्वास और न्याय दिलाना भी है।

🧑‍⚖️ अधिनियम की मुख्य विशेषताएं:

  • केवल विवाहित महिलाएं ही नहीं, बल्कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली या घरेलू रिश्ते में रहने वाली सभी महिलाएं इसके दायरे में आती हैं।

  • यह कानून शारीरिक, मानसिक, यौन, मौखिक और आर्थिक सभी प्रकार की हिंसा को कवर करता है।

  • इस अधिनियम के अंतर्गत महिला मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

  • इसमें Protection Officer की नियुक्ति की जाती है जो महिला की मदद करता है।



 घरेलू हिंसा की परिभाषा

घरेलू हिंसा अधिनियम के अनुसार, घरेलू हिंसा में निम्नलिखित प्रकार की हिंसा आती है:

  1. शारीरिक हिंसा – मारना, धक्का देना, जलाना आदि

  2. मानसिक या भावनात्मक हिंसा – गालियाँ देना, अपमान करना, धमकाना

  3. यौन हिंसा – बिना सहमति यौन संबंध बनाना

  4. आर्थिक हिंसा – पैसे न देना, ज़रूरी चीजें न देना, नौकरी करने से रोकना

  5. मौखिक हिंसा – ताना देना, जातिगत टिप्पणी करना



 महिलाओं के अधिकार (Women’s Rights under the Act)

1. सुरक्षा का अधिकार (Right to Protection)

महिला को सुरक्षा देने के लिए न्यायालय Protection Order जारी कर सकता है ताकि आरोपी उससे संपर्क न कर सके।

2. निवास का अधिकार (Shared Household Rights in India)

महिला को अपने वैवाहिक या साझा घर में रहने का अधिकार है। पति या परिवार उसे जबरन घर से निकाल नहीं सकते।

3. आर्थिक सहायता (Monetary Relief)

अगर महिला को घरेलू हिंसा के कारण आर्थिक नुकसान हुआ है, तो अदालत उसे Monetary Relief देने का आदेश दे सकती है।

4. हिरासत का अधिकार (Custody Rights)

बच्चों की अस्थायी कस्टडी भी महिला को दी जा सकती है ताकि वह सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जी सके।

5. मुआवजा आदेश (Compensation Order)

महिला को मानसिक या शारीरिक नुकसान के लिए अदालत द्वारा मुआवजा दिलवाया जा सकता है।



 घरेलू हिंसा कानून की धाराएँ (Important Sections of the Act)

धाराविवरण
Section 3घरेलू हिंसा की परिभाषा
Section 4शिकायत दर्ज कराने का अधिकार
Section 5संरक्षण अधिकारी की सूचना प्रक्रिया
Section 12मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन
Section 14काउंसलिंग का आदेश
Section 17महिला के निवास का अधिकार
Section 18सुरक्षा आदेश (Protection Order)
Section 19निवास आदेश
Section 20आर्थिक सहायता
Section 21बच्चों की कस्टडी
Section 22मुआवजा आदेश


 Shared Household Rights in India

भारत में Shared Household का मतलब है वह घर जहां पति-पत्नी या लिव-इन पार्टनर साथ रहते हैं। महिला को इस घर में रहने का अधिकार है, चाहे वह घर पति के नाम हो या किराए का हो। वह बिना कोर्ट के आदेश के जबरन नहीं निकाली जा सकती।

यह प्रावधान महिलाओं के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार पति या ससुराल वाले उसे घर से निकाल देते हैं। लेकिन यह कानून महिला को अपने साझा निवास स्थान (Shared Household) में रहने का अधिकार देता है।



 Protection Order in Domestic Violence

Protection Order एक कोर्ट का आदेश होता है जिसके अंतर्गत आरोपी को महिला से संपर्क करने, पीछा करने, धमकाने या उसे किसी प्रकार की हानि पहुँचाने से रोका जाता है।

Protection Order के फायदे:

  • महिला की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

  • आरोपी महिला के पास नहीं आ सकता।

  • अगर आरोपी इस आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है।


 Domestic Violence से बचाव के उपाय

घरेलू हिंसा से बचाव केवल कानून के भरोसे नहीं किया जा सकता। इसके लिए सामाजिक जागरूकता, आत्मनिर्भरता और परिवार में समानता जरूरी है।

✅ कुछ महत्वपूर्ण उपाय:

  1. साक्षरता और शिक्षा – महिलाएं शिक्षित हों तो वे अपने अधिकार जान सकती हैं।

  2. आर्थिक आत्मनिर्भरता – आर्थिक रूप से मजबूत महिलाएं शोषण से लड़ सकती हैं।

  3. काउंसलिंग और हेल्पलाइन का सहारा – समय पर परामर्श लेना फायदेमंद हो सकता है।

  4. 112 या 181 हेल्पलाइन नंबर का उपयोग – खतरे के समय पुलिस को तुरंत सूचना दें।

  5. प्रोटेक्शन ऑफिसर से संपर्क – अपने जिले के Protection Officer से मिलें।



 घरेलू हिंसा में सहायता प्राप्त करने के तरीके

  • राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW)

  • 181 महिला हेल्पलाइन

  • नजदीकी पुलिस स्टेशन

  • NGOs और महिला आश्रय गृह

  • Protection Officer / जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)



 Legal Protection for Women in India

भारत में महिलाओं के लिए केवल घरेलू हिंसा अधिनियम ही नहीं, बल्कि अन्य कई कानून भी सुरक्षा प्रदान करते हैं:

  1. दहेज निषेध अधिनियम, 1961

  2. धारा 498A, भारतीय दंड संहिता

  3. बलात्कार विरोधी कानून (Section 375-376 IPC)

  4. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम, 2013

  5. POSCO Act (बच्चियों की सुरक्षा के लिए)

  6. सिविल प्रक्रिया संहिता और पारिवारिक न्यायालय अधिनियम



 निष्कर्ष (Conclusion)

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 एक सशक्त और महिला केंद्रित कानून है जो महिलाओं को उनके घर में ही सुरक्षित रहने का अधिकार देता है। अगर कोई महिला घरेलू हिंसा का शिकार होती है तो उसे डरने की जरूरत नहीं है। वह कानून का सहारा लेकर न्याय पा सकती है।

महिलाओं को अपने अधिकार जाननाकानून का प्रयोग करना, और जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेना बेहद जरूरी है।

घरेलू हिंसा एक गम्भीर सामाजिक अपराध है जो महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रभावित करता है। "घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005" की धारा 11 से 19 तक महिला सुरक्षा को एक कानूनी ढांचा प्रदान करती हैं जिससे पीड़िता न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके, बल्कि अपराधी को न्यायिक रूप से सजा दिलवा सके।

यह कानून केवल न्याय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में महिलाओं के सम्मान और गरिमा की रक्षा करता है। समाज, परिवार और सरकार — तीनों का यह कर्तव्य बनता है कि वे इस कानून की पूरी समझ और सहयोग के साथ पीड़िताओं की सहायता करें।



अकसर पूछे  जाने वाले सवाल | FAQs in Hindi


प्रश्न 1:  घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 11 क्या कहती है?

उत्तर: धारा 11 के अनुसार केंद्र और राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस अधिनियम का प्रचार-प्रसार करें, संबंधित अधिकारियों को प्रशिक्षण दें और विभागों के बीच समन्वय स्थापित करें ताकि इस कानून को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।


प्रश्न 2:  पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से कैसे राहत मांग सकती है?

उत्तर: धारा 12 के अनुसार, पीड़िता स्वयं, या उसके behalf पर कोई अन्य व्यक्ति मजिस्ट्रेट को आवेदन दे सकता है। इसमें सुरक्षा आदेश, मुआवजा, निवास अधिकार आदि की मांग की जा सकती है।


प्रश्न 3:  आरोपी को नोटिस कैसे दिया जाता है?

उत्तर: धारा 13 के अनुसार, मजिस्ट्रेट द्वारा तय की गई तारीख की सूचना दो दिनों के भीतर संरक्षण अधिकारी के माध्यम से आरोपी को दी जाती है, और इसकी पुष्टि शपथ पत्र के द्वारा होती है।


प्रश्न 4:  क्या काउंसलिंग का विकल्प इस अधिनियम में है?

उत्तर: हाँ, धारा 14 के अनुसार मजिस्ट्रेट काउंसलिंग का आदेश दे सकता है। इसके लिए योग्य और अनुभवी परामर्शदाता को नियुक्त किया जाता है।


प्रश्न 5:  कल्याण विशेषज्ञ क्या होता है?

उत्तर: धारा 15 के तहत मजिस्ट्रेट किसी महिला कल्याण विशेषज्ञ को कार्यवाही में सहायता हेतु नियुक्त कर सकता है, जिससे सामाजिक और मानसिक पक्ष को भी ध्यान में रखा जा सके।


प्रश्न 6:  क्या कार्यवाही गोपनीय रूप से की जा सकती है?

उत्तर: हाँ, धारा 16 के अनुसार यदि आवश्यक हो या किसी पक्ष की मांग हो, तो मजिस्ट्रेट कैमरा में (In-camera) कार्यवाही का आदेश दे सकता है ताकि पीड़िता की गरिमा बनी रहे।


प्रश्न 7:  Shared Household का क्या मतलब है?

उत्तर: धारा 17 के अनुसार, महिला को उस घर में रहने का अधिकार है जहाँ वह अपने पति या परिवार के साथ रहती है, चाहे वह घर उसके नाम न हो। उसे जबरन घर से नहीं निकाला जा सकता।


❓प्रश्न 8:  Protection Order क्या होता है?

उत्तर: धारा 18 के अनुसार, यदि मजिस्ट्रेट को लगे कि महिला के साथ हिंसा हुई है या हो सकती है, तो वह आरोपी को महिला से संपर्क करने, हिंसा करने या उसकी संपत्ति में दखल देने से रोक सकता है।

प्रश्न 9:  Residence Order के तहत क्या आदेश दिए जा सकते हैं?

उत्तर: धारा 19 के अनुसार, मजिस्ट्रेट महिला को घर से निकाले जाने से रोक सकता है, आरोपी को घर से बाहर करने का आदेश दे सकता है, या महिला के लिए वैकल्पिक निवास की व्यवस्था का आदेश दे सकता है।


प्रश्न 10:  क्या यह कानून केवल विवाहित महिलाओं पर लागू होता है?

उत्तर: नहीं, यह कानून लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं या किसी भी घरेलू रिश्ते में रह रही महिलाओं पर भी लागू होता है।


प्रश्न 11:  यदि आरोपी Protection Order का उल्लंघन करे तो क्या होगा?

उत्तर: अगर आरोपी Protection Order का पालन नहीं करता है, तो यह अपराध माना जाएगा और उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।


प्रश्न 12:  सहायता प्राप्त करने के लिए महिला कहाँ जा सकती है?

उत्तर: महिला राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW), नजदीकी पुलिस स्टेशन, Protection Officer, DLSA (District Legal Services Authority), NGOs या 181 हेल्पलाइन से सहायता ले सकती है।


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